आत्मा का मुक्ति: अष्टावक्र के उपदेश का अध्ययन

अष्टावक्र गीता, एक प्राचीन ग्रंथ है, जिसमें आत्मा और मुक्ति के महत्वपूर्ण विचारों का विवेचन किया गया है। इस ग्रंथ में अष्टावक्र ऋषि द्वारा आत्मा के धर्म के विषय में विचार किए गए हैं। अष्टावक्र ऋषि का कहना है कि आत्मा का कोई धर्म नहीं है और मुक्ति केवल अपने को स्थूल देह से परे करके होती है। इस ब्लॉग पोस्ट में, हम अष्टावक्र ऋषि के उपदेश को गहराई से समझेंगे और आत्मा के मुक्ति के बारे में जानेंगे।

 
“भूख और प्यास-यह प्राण के धर्म हैं। शोक और मोह-मन के धर्म हैं। जन्म और मरण-सूक्ष्म देह के धर्म हैं। राजन्! आत्मा का कोई धर्म नहीं है। जो उत्पन्न होता है, बढ़ता है, परिणाम को प्राप्त होता है। क्षण-क्षण में क्षीण होता है, अन्त में नाश को प्राप्त होता है। यह स्थूल शरीर का धर्म है, आत्मा का नहीं, अपने को स्थूल देह से परे कर निर्विकार होने पर सच्चिदानन्द, परम शीतल, परमात्मा का रूप प्राप्त कर, क्रियारहित हो, मुक्ति प्राप्त होती है।-अष्टावक्र”
 

भूख और प्यास – प्राण के धर्म:

अष्टावक्र ऋषि के अनुसार, भूख और प्यास जीवन के प्राण के धर्म हैं। ये आवश्यकताएं हैं जो हर जीवन को बनाए रखने के लिए होती हैं। इनके बिना, जीवन संचालन संभव नहीं होता। भूख और प्यास न केवल शारीरिक आवश्यकताएं हैं, बल्कि मानसिक और आत्मिक आवश्यकताओं का भी प्रतीक हैं। यह जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो हर जीव को जीने के लिए प्राप्त होता है।

शोक और मोह – मन के धर्म:

अष्टावक्र ऋषि के अनुसार, शोक और मोह मन के धर्म हैं। ये भावनाएं हैं जो हमारे मन को बाँधती हैं और हमें बाहरी जगत से जुड़ती हैं। शोक और मोह हमें आत्मा की सच्ची उपस्थिति से दूर करते हैं और हमें संयम और स्वाध्याय की ओर निरंतर बढ़ते रहने से रोकते हैं।

जन्म और मरण – सूक्ष्म देह के धर्म:

अष्टावक्र ऋषि के अनुसार, जन्म और मरण सूक्ष्म देह के धर्म हैं। यानी कि यह सिर्फ शारीरिक देह के परिणाम हैं और आत्मा को नहीं प्रभावित करते। जन्म और मरण सिर्फ शारीरिक प्रक्रियाएं हैं जो हर जीवन के साथ होती हैं, लेकिन आत्मा इससे अलग है।

आत्मा का कोई धर्म नहीं है:

अष्टावक्र ऋषि का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है कि आत्मा का कोई धर्म नहीं है। आत्मा स्वयं में निर्विकार है, अचल है, और सच्चिदानंद स्वरूप है। इसका मतलब है कि आत्मा को किसी प्रकार का कर्म या धर्म नही होता है, क्योंकि वह स्वयं में पूर्णतः परिपूर्ण है। अष्टावक्र ऋषि का यह दृष्टिकोण आत्मा के अद्वितीय और अबिन्न स्वरूप को प्रकट करता है।

क्षण-क्षण में क्षीण होता है, अन्त में नाश को प्राप्त होता है:
अष्टावक्र ऋषि के अनुसार, शारीरिक देह या मन के धर्म में लिपटे रहने से आत्मा क्षण-क्षण में क्षीण होती है, और अंत में नाश को प्राप्त होती है। इसका मतलब है कि जब हम अपने आत्मिक स्वरूप को भूल जाते हैं और शारीरिक या मानसिक पहलुओं में उलझ जाते हैं, तो हमारी आत्मा का दर्दनाक नाश होता है।

आत्मा का मुक्ति: सच्चिदानंद की प्राप्ति:
अष्टावक्र ऋषि के अनुसार, आत्मा का मुक्ति तभी प्राप्त होता है जब हम अपने को स्थूल देह से परे करके आत्मा के निर्विकार और परम शीतल स्वरूप को पहचानते हैं। इससे हम मोह, शोक, और संबंधों के बंधन से मुक्त होते हैं और आत्मा की परमात्मा के साथ एकता प्राप्त करते हैं।

समापन

अष्टावक्र ऋषि के उपदेश से हमें यह सिखने को मिलता है कि आत्मा का कोई धर्म नहीं है और सच्ची मुक्ति आत्मा के स्वरूप को पहचानकर ही प्राप्त होती है। इससे हम अपने जीवन को आत्मा के महत्वपूर्ण पहलुओं के साथ जी सकते हैं।

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